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मैं

खाक़सार हूँ मैं इस ज़माने में, सारा जहाँ है इक कैनवस,मुझ दीवाने का, खींचता रहता हूँ इसी कैनवस पर लकीरें, कुछ बन जाती हैं तसवीरें, कुछ रूप ले लेती हैं किसी अफ़साने का।