शाम
ये शाम सज कर आई है आज मेरे लिए , होठों पे लिए मुस्कान और जलाये तारों के दीये , कभी यों लगता है मैं बना हूँ इसके लिए, और ये बनी है सिर्फ़ मेरे लिए गर तुम भी देख पाओ इन अंधेरों की रौशनी को, तो जान जाओगे कि हर रौशनी जली है किसी अंधेरे के लिए
मेरी भी एक मधुशाला है ,यह बच्चन जी की मधुशाला की हाला का कतरा भर भी नही,फिर भी ये मेरी मधुशाला है .इसमे हर पीने वाले का स्वागत है ..हर उस दोस्त का स्वागत है जो इस जीवन मधुशाला को और जानना चाहता है ..मेरी मधुशाला एक प्रयास है ख़ुद को जानने का...उम्मीद है यह इस जीवन की कसौटी पर खरी उतरेगी.