हाय रे इंसानियत !!!!!!!!

एक शहर धमाकों से फिर दहला है,फिर चंद इंसानों ने इंसानियत को फिर शर्मसार किया है ......क्या हमारी ज़िन्दगी उन्हीं लोगों के हाथ कठपुतली बन गई है ??? धुआं सा उठता दीखता है, कहीं तो आग ज़रूर लगी होगी ?? सवाल ये नहीं, की घर तेरा जला या मेरा ?? पर हर ज़ख्म की टीस पर इंसानियत कितना रोई होगी?? फिर से दहली इंसानियत , दहशतगर्दों का मकसद क्या रहा होगा ?? सवाल ये नहीं, की वो कौन था ?? पर इंसानियत को शर्मसार करने वाला, वो भी तो कभी इन्सान रहा होगा ?? हाय रे इंसानियत,तुझे अब इंसान से ही है खतरा, जाने तेरा नसीब क्या होगा ?? सवाल ये नही, कि कौन मरा ,या कौन ज़ख्मी हुआ ?? पर ए इंसान किसी के ज़ख्मो को महसूस कर , दर्द तेरे सीने भी ज़रूर होगा !!!!!!!!!