मैं अकेला ही चलूँगा ......
अब मैं अकेला ही चलूँगा जानिबे अमन! कितनी भी कठिन डगर हो, हर कदम गुमराह होने का डर हो, जीत बसी है मेरे हर तस्सवुर में, इक रोज़ हासिल करूँगा मैं मंजिल को!!! बंद दरवाजों में सहमे बैठे हैं लोग , कुछ खफा खफा,नाराज़ से लोग , उन तक ये पैगाम पहुंचे , ज्यों जलेगी एक भी शम्मा ,दूर अँधेरा होगा!!!! सुना है ,कल जली थी एक शम्मा , आज सैंकडों शम्मे रौशन होंगी , जिस राह पर मैं कल तलक था तन्हा, उस राह पर आज सारी दुनिया होगी!!!!! मैं अकेला ही चला था जानिबे अमन ,आज देखो मेरे सैंकडों हां थ हैं !!!!!!!!!!!!!!